एक चिंगारी सुलगते हुए ज्वाला का रूप कब ले लेती है पता नही चलता। इसी प्रकार प्यार की आग इंदिरा और रुहान के दिल को, तन-बदन को जला रही थी। दोनो घंटो बाते करते। मगर मिलने की प्यास सिर्फ बातो से बुझे भी तो कैसे। इंदिरा जिस हुद्दे पर काम कर रही थी, वहासे उसका दिल कितना भी चाहे, मनचाही छुट्टी लेना आसान बात नही थी। एक दिन की छुट्टी मतलब दूसरे दिन काम का बोझ ऐसे बढ़ जाता कि पूछिये मत। और इंदिरा पर कई जिम्मेदारियां भी तो थी। अपने घर मे लाड़ प्यार से पली बढ़ी इकलौती इंदिरा शादीशुदा तो थी पर अपनी शादिसे उम्मीद छोड़ चुकी थी। जिस लड़किने कोई भी काम आधा अधूरा नही किया हो उसकी शादी सही मायनों में पूरी हो ही नही पायी। पति से लड़ाई झगड़े जैसे आम बात हो। और ये रिश्ता ही तो एक ऐसी चीज़ थी जो उसने खुदके लिए खुद चुनी थी। पिताजी का राजकीय व्यक्तित्व , मन में बैठा हुआ डर इन सबके कारण इंदिरा अपनी घुटन जाहिर कर ही नही पाती थी। बल्कि शादी के उस दलदल में वो फसती जा रही थी। इंदिरा की एक साल की बेटी ‘कियारा’उसकी जान थी। पर कियारा के सामने लड़ाईयों का रूप मारपीट और गाली गलौच में बदला तब इंदिरा के आत्म सम्मान को बुरी तरह ठेस लग गयी ,वह सह नही पायी। उसने अब यह पिंजरा तोड़कर खुले आसमान में उड़ने का फैसला कर लिया था। पर इस निर्णय तक आने में उसे बहुत वक्त लगा। आगे का सफर आसान नही था। office के निर्णय बखूबी लेनेवाली इंदिरा निजी जीवन मे बहुत संवेदनशील थी। कियारा के बारे में सोच सोच के वह चिंतित हो जाती। खुद के अकेले रहने के बारे में वह सोच भी नही रही थी। एक गलत रिश्ते में बंधे रहने से बेहतर वह अकेले रहना पसंद करती थी। ऐसे में उसके पिताजी और दोस्त उसकी ताकद बने। पर उसने कभी सोचा भी नही था के इस पड़ाव में आकर उसे सच्चा प्यार हो जाएगा। बातो बातो में इंदिरा ने अपनी पूरी कहानी रुहान को बता दी थी। रुहान ने भी इस निर्णय में उसका साथ ही दिया। पर वह हमेशा सोचता के काश वे दोनों पहले मिले होते। इंदिरा शादीशुदा न होती। तो उसके घर से इंदिरा और उसका रिश्ता खुशी खुशी मान लिया जाता। यहा तो कहानी ज्यादाहि मुश्किल थी। पर कहते हैं ना,आसानी से मिले वह प्यार , प्यार क्या?
दिमाग कहता था, आगे दोनो का भविष्य कुछ नही है पर नदी का बहाव अगर तेज हो तो समंदर से मिलने से उसे कौन रोक सकता है। दोनो ने तय कर लिया था कि वे आगे की नही सोचेंगे। आज मे जियेंगे। कल वैसे भी किसने देखा है? और आज में उनकी सबसे बड़ी समस्या सिर्फ यह थी कि वे दोनों कब और कैसे मिले। ऐसे में इंदिरा के पिताजी एक दिन पार्टी के काम से शहर से बाहर जानेवाले थे। अगली सुबह को वे लौटनेवाले थे। पर वह एक शाम उन दोनों के लिए क्या थी आप सब जान ही चुके होंगे। रुहान को सफर करना कुछ खास पसंद नही था पर इंदिरा के लिए किसी भी कोने से सफर करना उसके लिए बड़ी बात नही थी। 15 अक्टूबर 2017, मिलनेका दिन तय हो गया। इस बार रुहान ने इंदिरा के पसंद से पहनावा किया था। आसमानी रंग की शर्ट और जीन्स। रुहान का कद लंबा था और कसा हुआ शरीर, उसपे ऐसा पहनावा बहुत अच्छा दिखता था। इंदिरा ने घर समेटकर रखा था। कियारा को खेलने के लिए पड़ोस में भेज रखा था। बेचैन दिल से बार बार दीवार पर टंगी घड़ी को इंदिरा देखे जा रही थी जैसे वक्त को देखने से उसकी रफ्तार बढ़ जाएगी। और देखते देखते वह पल आ गया। जैसे ही door bell बजी,इंदिरा का दिल जोरो से धड़क उठा। इंदिरा खुद में एक बदलाव महसूस कर रही थी। जैसे फिरसे यौवन की सीढ़ी चढ़ रही हो। यह अल्हड़ पन, यह बेचैनी, रुहान के लिए उसकी कशिश सब पहले तो कभी नही हुआ था। दरवाजा खोलते ही रुहान को अपने सामने पाकर उसके गाल खिल उठे। रुहान को भी इंदिरा को देखकर ऐसे महसूस हुआ जैसे सालो से तपे हुए तन को अचानक से बरगद की छांव मिली हो। रुहान को इंदिरा का रहनसहन पहलेसेही भाता था। इंदिरा का घर भी वैसे ही था। हर चीज़ अपने जगह पर अच्छेसे रखी हुई। दीवार पर कियारा की बडी तस्वीर लगाई हुई थी। और राइटिंग टेबल पर इंदिरा की डायरी थी। शायद इंदिरा को लिखने का भी शौक था। रुहान को हमेशा यही लगता के और बहुत कुछ जानना है उसे। और अपने बारे में सब कुछ बताना भी है।
इंदिरा ने रुहान को अपने उस कोने में बिठाया जहा उसने किसीको नही बिठाया था। इंदिरा एक party person लड़की थी। दोस्तो के साथ बाहर घूमना, कभी उनके साथ drink करना उसके लिए आम बात थी। पर इंदिरा को सबसे ज्यादा पसंद था अपने कोने में बैठकर चाय पीना। इंदिरा को चाय इतनी पसंद थी कि कोई उसे चाय के लिए पूछे तो वह मना नही कर पाती थी। पर खुद के हाथों से बनी चाय पीने के लिए उसने किसीसे जिक्र तक नही किया था। पर रुहान के साथ इंदिरा को ऐसे लगता था जैसे वह खुद से ही मिल रही हो। इसके विपरीत रुहान को चाय पीने की बिल्कुल आदत नही थी। पर इंदिरा के साथ वह सब कुछ जीना चाहता था। इंदिरा के कमरेकी वह भारतीय बैठक,उसपर बैठे हुए वे दोनों प्रेमी और दो कप चाय। इससे बेहतर और क्या हो सकता है। चाय की एक प्याली दिमाग ताजा कर देती है पर चाय का असली स्वाद शब्दो मे कौन बता सकता है? पर फिरभी चाय की महक अपनी और खिंच ही लेती है जैसे प्यार हमे अपने आगोश में ले ही लेता है। देखा जाए तो बहुत आम मुलाकात थी। पर वे दोनों जानते थे वे क्या बाट रहे हैं। हमेशा याद रहनेवाले हसीन लम्हे, अधूरे सपने, एक मनचाही शुरुवात और प्यार भरा एहसास.....
चाय पीने के बाद इंदिरा रुहान की गोद मे सर रखकर लेट गयी। रुहान अपने हाथों से इंदिरा के बाल सहला रहा था। बचपन मे इंदिरा जब भी पापा की गोद मे ऐसे ही सोया करती थी, उसे पापा का हाथ सिर पर घूमते ही नींद आ जाती थी। अब तो गहरी नींद सोये हुए जैसे जमाना हो गया था। आज रुहान का हाथ इंदिरा के बालोको छू रहा था, नजाने क्यों इंदिरा के आंसू छलक पड़े। ऐसे प्यार भरे स्पर्श के लिए मानो तरस गयी हो सालो से। रुहान ने बड़े प्यार से इंदिरा के गालो को छूआ। अपने हाथों में उसके गाल पकड़कर माथे को चुम लिया तब इंदिरा और रुहान की आंखे मिली। कितना कुछ था उन दोनों की आंखों में। सच है, आंखे जो बातें कहती है, शब्द कभी बयान नही कर पाते। रुहान ने इंदिरा को अपने पास खिंच लिया। अब मिलने की बारी सांसो की थी। आज दोनो के होंठ कुछ इस कदर मिल रहे थे जैसे अरसे से यह अहसास हुआ ही न हो। दोनो दीवानो की तरह एक दूसरे से लिपट गए थे। उस शाम प्यार की कुछ ऐसी बरसात हुई कि सर से लेकर पैरों तक दोनो भीग भी गए थे और फिर भी लग रहा था कोई कोना अभी भी सूखा है। चाय की प्याली गरम गरम पी ले तो जबान जल जाती है ना।चाय थोड़ा ठंडा होनेकी राह तो देखनी ही पड़ती है। उसी तरह, इंदिरा और रुहान....जीवन की आग में तपे हुए दो प्रेमी, आज एक दूसरे को प्यार तो कर रहे थे पर यह आग जिस्म की होती तो शांत भी हो जाती। यहा आग तन मन दोनों के परे थी। प्यार की चिंगारी अभी अभी तो सुलगी थी जिसमें दोनों की रूह एक हो चुकी थी। अब यह ज्वाला सब कुछ राख करेगी या दिया बाती बनके सबको रोशनी देगी यह तो वक्त ही बताएगा।
To be continued--
Sunday, February 17, 2019
एक कोना और दो कप चाय -पहली चाय
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