इंदिरा आज काम तो कर रही थी पर आंखे बार बार घड़ी देखे जा रही थीं। सुबह से दो बार रुहान से बात भी हो चुकी थी। इंदिरा को यह देखकर खुदही पर इतना आश्चर्य हो रहा था कि कोई उससे मिलने आ रहा है इस बात पर उसका दिल इतनी जोरो से धड़क उठेगा। रुहान घर से निकल चुका था। रुहान के घरसे इंदिरा का office करीब दो घंटों का सफर था। और ये दो घंटे सिर्फ उस आधे घंटे के लिए बितने वाले थे। रुहान को पता नही था कि यह आधे घंटेकी मुलाकात उसकी जिंदगी बदलनेवाली थी। रुहान के आँखों के सामने से उसका बिता कल किसी फिल्म की तरह यूँ ऐसे गुजरा जैसे ट्रेन की पटरी परसे ट्रेन गुजर जाती है। रुहान जैसा भी था , था तो दिलवाला लड़का। व्यापार कारोबार से घरका रिश्ता होनेवाला रुहान किसी भी मामले में व्यापार करना नही जानता था। वह सुनता तो बस्स खुदके दिल की। गलती हुई तो भी मेरी और अच्छा हुआ तो भी दिल का सुनके गलत नही किया इतनी आसान सोच थी उसकी। इंदिरा से कल घंटो बात करना और आज उसे मिलने के लिए कहासे कहा सफर करना उसके दिल की ही आवाज थी। यहा इंदिरा ने office में पहले से बता रखा था कि आज किसी सहेली के साथ वह lunch करेगी। उसे पता था, दोनो को कुछ ज्यादा वक्त नही मिलेगा पर फिर भी वह रुहान को आने से मना नही कर पाई थी।
घड़ी की सुईयों ने आखिर दोनो के दिल की सुन ली। रुहान स्टेशन पोहोच गया था जहासे इंदिरा उसे MacD लेकर जानेवाली थी। रुहान ने तो पहले ही कहा था ना , खाने के लिए मैं कही पर भी जा सकता हूं। सच भी था वैसे। रुहान को अलग अलग तरह के व्यंजन खाना बेहद पसंद था पर आज वह खाने के लिए नही किसीको जी भर के देखने के लिए, किसी से पेटभर बाते करने के लिए आया था। इंदिरा स्टेशन पोहोच गयी थी पर रुहान तो दिख नही रहा था। दोनो की फोन पर बात हुई तब पता चला,रुहान ने इंदिरा की बात गलत समझ ली थी और वह तय स्थान के काफी आगे जाकर रुका था। पहले से वक्त कम था और उसमें एक दूसरे की खोज में जो वक्त जाया हो रहा था , रुहान को खुद पर ही गुस्सा आ रहा था। इंदिरा की आंखे रास्ते पर चीते की तरह घूम रही थी और आहा.....वह रहा रुहान.....इंदिरा को आखिर उसका रुहान दिख ही गया जो अभीभी उसे ढूंढ रहा था। पलभर स्टेशन के उसी भीड़ में इंदिरा अपने ही जगह पे खडी हो गयी, रुहान को आते वक्त देखना जैसे आसपास का चित्र उसके लिए उस पल ठहर गया था। चल रहा था तो उसका रुहान और दौड़ रही थी , इंदिरा की धड़कन। अब जाकर इंदिरा थोडी सम्भली और उसने रुहान को बताया के वह उसे देख पा रही है और वह जहा है वही पर रुके।क्योंकि वही से ऑटो लेकर दोनो को MacD तक जाना था। अब वह पल था, जब रुहान की सांसें रुक गयी थी। जिस पल उसने इंदिरा को देखा बस्स वह देखते ही रह गया। इसी पल के इंतजार में जैसे पूरी जिंदगी बित गयी हो। रुहान के ज़िन्दगी में तो कई लड़कियां आयी थी। किसी एक से जिंदगी भर का प्यार होना जैसे उसके लिए असंभव हो। पर इंदिरा को पहली दफा देखा तबसे लेकर यह आजकी मुलाकात रुहान के दिल से कुछ कह रही थी। जैसे उसका दिल संभालने वाली उसे मिल गयी। उसकी soulmate, जिसे वह कबसे ढूंढ रहा था। इंदिरा को देखते ही रुहान को उसे गले लगाना था। वह तो था ही दीवाना। पर उसने खुदको संभाला। सोचा यह पहली मुलाकात है वह क्या सोचेगी। दोनो ने ऑटो ली। और बैठतेही दोनों की आंखे एक दूजे में खो गयी। दोनो इतने अजनबी थे के पहली मुलाकात में बात होना भी मुश्किल लगे। पर यहाँ आंखों से आंखे और होंठो से होंठ कब मिले उन्हें पता ही नही चला। स्टेशन से MacD अमूमन १० मिनट का अंतर था। पर आज मानो २ मिनट में ही पार हो गया। रुहान को बड़ा अटपटा लगा के इतनी जल्दी दोनों पोहोच भी गए। रुहान आज इंदिरा के सामने रुहान बनकर दो पल जी लेना चाहता था। इसीलिए उसने अपना पहनावा भी साधारण ही रखा था जो उसका comfort zone था। सफेद रंग की tshirt जिसमे आड़ी रेखाएँ थी और नीचे पजामा। जब इंदिरा ने रुहान को देखा था तब एक पल को तो उसे भी रुहान का पहनावा पसंद नही आया था। वह खुद भी तो इतना तय्यार हुई थी उसके लिए। और पहली दफा जब उसने रुहान को देखा था वह रुहान और आजका रुहान दोनो में काफी अंतर था। उस दिन रुहान एक बेहद खूबसूरत लड़का जिसमे तमीज है, जो काफी तजुर्बा रखता है जिंदगी का कुछ इसी प्रकार की छवि थी इंदिरा के दिल मे। और आज रुहान एक खुशमिजाज लड़का जिसमे आज भी एक बच्चा ज़िंदा है ऐसे ही मालूम हो रहा था। आज तक के इंदिरा के स्वभाव अनुसार रुहान उसे पसंद नही आता पर यहाँ बात कुछ और ही हो रही थी। इस बच्चेवाले रूप पे इंदिरा का दिल और ही आ रहा था। उसे रुहान के बारे में सब कुछ जानना था। और अपनी जिंदगी की किताब उसके सामने खोल कर रखनी थी। MacD में ऑर्डर देकर दोनो एक table लेकर बैठ गए। दोनो की नजरें होठो से ज्यादा बाते कर रही थी। दिवाना रुहान वहा पर भी इंदिरा को छूना चाह रहा था। उसके गालो को अपने हाथोंमें थामकर उसके होठो को चूमना चाहता था। पर इंदिरा की नजरें पीछे बैठी लड़कियों को देखकर रुहान को रोक रही थी। इंदिरा के लिए तो दुनियां के सबसे खूबसूरत लड़के के साथ वह बैठी हुई थी और सब उन्ही को देख रहे थे। ऐसे में रुहान की इच्छा कैसे पूरी हो। बातो बातो में समय पर लगाकर उड़ गया। जहा आधे घंटे के लिए मिल रहे थे वहां घंटेभर के ऊपर ही दोनों वहा बैठे थे। दिल तो वापसी के लिए मान ही नही रहा था। रुहान ने तो इंदिरा को छुट्टी लेने को भी कह दिया। पर office का कुछ अनुशासन होता है। इंदिरा चाहकर भी छुट्टी लेकर रुहान के साथ वक़्त बिता नही पा रही थी। ना चाहते हुए भी दोनो वहा से निकले। रुहान washroom जाना चाहता था। MacD की इमारत दो मंजिला थी। और washroom ऊपर की मंजिल पर था। इंदिरा नीचे ही रुहान के लिए रुकी थी। तभी इंदिरा का फोन बजा। रुहान का ही फ़ोन था। उसने इंदिरा को ऊपर आने के लिए कहा। इंदिरा भली भांति जानती थी के रुहान उसे क्यो बुला रहा है और इंदिरा ने ऐसा पागलपन कभी नही किया था। पर नजाने क्यों, रुहान की आवाज में वासना की पुकार नही,प्यार की मिठास थी जो इंदिरा को खिंच रही थी। इंदिरा असमंजस में थी के वह क्या कर रही है पर उसके पैर ऊपर की सीढ़ियां चढ़ चुके थे। ऊपर पोहोची तो इंदिरा ने देखा वहां कोई भी नही था और लड़कों की washroom से रुहान इंदिरा को ही देख रहा था। दरवाजे की छोटीसी खुली जगह से रुहान कि आंखे बड़ी प्यारी लग रही थी। इंदिरा मन ही मन बहुत डरी हुई थी कि किसीने देख लिया तो लोग क्या सोचेंगे। पर रुहान को मना भी तो नही कर पा रही थी। डरी सहमी इंदिरा जैसे ही washroom के अंदर गयी, रुहान ने उसे दीवार पर दबाकर खड़ा किया और खुद उसे प्यार करने लगा। रुहान के हाथ इंदिरा को तेजी से छू रहे थे। रुहान के होंठ कभी इंदिरा के होंठो को चूमते तो कभी उसके सीने को छूते। इंदिरा उस पल में सारी शर्म चिंता भूल ही रही थी कि बाहर से किसीने दरवाजा खटखटाया। अब इंदिरा बहुत ज्यादा डर गई।बाहर का आदमी तो कही नही जानेवाला था पर वह अब बाहर कैसे निकले। उसे लगा कोई जादू हो और वह गायब हो जाये। पर कलियुग में चमत्कार कहा होते हैं? रुहान भी डरा तो था। उसे खुदकी चिंता नही थी। पर इंदिराको कोई गलत नजरियेसे देखे ये उसे मंजूर नही था। उसने आहिस्ता दरवाजा हल्केसे खोलकर देखा तो बाहर एक लड़का खड़ा था जिसे washroom का इस्तेमाल करना था। रुहान ने फिर एक बार दरवाजा लगा दिया। इंदिरा का सबर अब टूट रहा था। एक तरफ वह office के लिए late भी हो रही थी। दूसरी तरफ यह दुविधा के बाहर कैसे निकले। पर रुहान को पूर्ण विश्वास था कि अब तक लड़का वहासे हट गया होगा। उसने उसी भरोसे के साथ दरवाजा खोला। सच मे वहा कोई नही था। उसने इंदिराको झटसे वहासे निकलने को कहा। इंदिरा सिर झुकाए जल्दीसे वहा से निकली। MacD में ऊपर जहा बैठनेकी व्यवस्था है वही पर वह लड़का टहल रहा था । इंदिरा की आंख के एक कोने ने उस लड़के को देखा तो पर अब वहा और रुकने की उसमे हिम्मत नही थी। जान लेकर नीचे उतरी इंदिरा नेMacD के बाहर निकल कर ही छुटकारा पाया। रुहान इंदिरा के office तक उसी के साथ चलने वाला था। दोनो को अभीभी विश्वास नही हो रहा था कि पिछले पांच मिनट पहले क्या हुआ। इंदिरा जो कि एक बहुत बडी job profile रखती थी उसके लिए यह पागलपन कोई मामूली बात नही थी। पर फिर भी उसे यह सब अलग और अच्छा लगा।
दोनो इंदिरा के office के बाहर खड़े थे। इंदिरा को अब रुहान से विदा लेना मुश्किल भी था और वक्त की नजाकत पर उतना ही जरूरी भी। दोनो ने विदा ले तो ली पर दोनों को पता था जिस कहानी की शुरुआत ही इतनी पागलपन के साथ हुई है, वह कहानी आगे जाकर एक दिलचस्प किताब बनेगी जिसे पढ़कर हर कोई फिरसे प्यार करना चाहेगा।
To be continued---
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