Sunday, February 17, 2019

एक कोना और दो कप चाय

                 बचपन का वह कोना आज भी याद होगा सभी को। जहाँ नजाने कितनी मस्ती,कितना खेलकूद आज भी गुंजता होगा। एक कोना ही तो होता है जहाँ हम खुद को समेटे खुद ही मे सिमटे रहना चाहते हैं।  हम बढ़े तो हो जाते हैँ पर मन ही मन वह बच्चा कही उसी कोने में सिमटकर रह जाता है।  ऐसे ही एक कोने की कहानी है यह......इंदिरा और रुहान की कहानी।वे दोनों और दो कप चाय.. एक गरमागरम रिश्ते की दिलचस्प कहानी।
इंदिरा और रुहान, एक दुसरे से कई दूर, अलग अलग संस्कृती मे पले बढे दो लोग। जिनमे वास्तविक कोई समान धागा होना लगभग नामुमकीन था। भाषांये भिन्न, खानपान, त्योहार किसीं चीझ मे देखा जाये तो कोई मेल ही नही। पर राह के कुछ ऐसे मोड पर दोनो मिले जैसे दोनो को एक दुसरे की ही तलाश थी। दोनो ने ही अपनी अपनी दुनिया के हर स्वाद को चखा था। फिर भी कुछ कमी तो थी। जैसे थाली भरी तो है मगर नमक किसीमे न हो। दोनो के ही दिल का वह सुकून भरा कोना खाली था। इंदिरा, एक बहुत बडे कोर्पोरटर की इकलौती संतान थी। देखनेवाले हमेशा यही सोचते की क्या किसमत पाई है लडकीने। जो चाहे उसे सब मिल सकता है। पर सचसे हमेशा समाज अन्जान ही होता है। दिखावे की चीझे तो सब थी उसके पास पर इंदिरा की खुशी उन सब मे नही थी। बचपन से ही इंदिरा के पैर संगीत की आगाझ पर थिरकते थे। पर नाच गाने को अलग ही रूप मे देखनेवाले उसके पापा को इंदिरा का नाचना बिल्कुल पसंद नही था। इंदिरा उसका इकलौता सपना कभी पुरा कर ही नही पायी। दिल के किसीं कोने मे हमेशा झुंजति इंदिरा बाहरी रूप से हमेशा मुस्कुराती खिलखिलाती। इंदिरा पे सारे दोस्त जान छिडकते थे। पर प्यार .....वहाँ भी कुछ अलग ही हाल था। इंदिरा का रूप देखकर , उसके स्वभाव के प्रति आकर्षित होकर बहुतोने उसे पाना चाहा। फर्क सिर्फ इतना कि हर बार इंदिरा ने जिसे प्यार समझा वह कभी प्यार न था। लोग आते तो थे पर किसी की मंजिल इंदिरा पता नही क्यों नही बन पाई। हमेशा दिल टूटने पर दिल खोलकर रोना चाहनेवाली इंदिरा आंखों में आंसू आये तो उन्हें भी आंखों से ही वापस लौटा देती। शायद किसी के जाने से इंदिरा को भी उतना फर्क नही पड़ा। शायद प्यार का असली स्वाद चखना अभी बाकी था। इंदिरा के आलीशान बड़े घर मे उसी के कमरे में एक कोना था जहाँ मात्र वह अकेले रहना पसंद करती थी। इंदिरा का बचपन, उसकी जवानी उसके सपने अगर किसी ने देखे थे तो वह था ‘वह कोना’।  नृत्य के सपने देखनेवाली इंदिरा पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थी। पर उसका काम सिर्फ चंद पैसे कमाने का साधन था उसके लिए जिससे वह खुदके पैरों पर खड़ी तो थी।
                   जहाँ इंदिरा मनचाही मंजिल चाहकर भी पा ना सकी वहाँ दूसरी ओर रुहान अपनी मंजिल के प्रति कोई समझौता नही करनेवाला इंसान था। उसके सपनें पाने के लिए हमेशा से ही घरसे अलग रह रुहान काम को ही उसका प्यार मानता था। कहते है ना, अगर अपनो का साथ हो तो मुश्किल सफर भी सुहाना हो जाता है। रुहान भी उसके घर का इकलौता बेटा था। माँ के आंखों का तारा रहनेवाला बच्चा सोचो माँ से दूर रहना कितना मुश्किल होता होगा। माँ का हाल भी कुछ अलग नही था। पर फिर भी अपनी ममता को संभाले दिल पर पत्थर रखके मा ने रुहान को मुम्बई भेज दिया। सपनो का शहर, मुम्बई। पर किसी पर दया भी ना करनेवाली मुम्बई। बहुत बार रुहान हिम्मत हार जाता था। ऐसे में माँ ही उसका ढाढस बंधा ती थी। पर कई बार रुहान को अकेलापन कांटने दौड़ता। रुहान ऐक्टर बनना चाहता था। किसी की सहारे के बिना सफर मुश्किल था पर रुहान में काबिलियत थी और खुदके सपनो पर रुहान को अडिग भरोसा था। जहाँ इंदिरा को शोर पसंद था वहाँ रुहान को शांति पसंद थी। इंदिरा को घूमना फिरना पसंद था तो रुहान को घर बैठकर चीज़े observe  करना अच्छा लगता था।
                   कला के प्रति रुचि यह देखा जाए तो एकमात्र धागा दोनो को बांध सकता था। पर कुदरत जब कोई कहानी लिखती है तब हर किरदार के पहलू कुछ अलग ही निखर आते हैं। वह 15 अगस्त का दिन था । इंदिरा को एक नृत्य प्रतियोगिता में शामिल होने का अवसर मिला था जहाँ रुहान भी एक प्रतियोगी था। रुहान वैसे भी अपने सपने को पाने की कोई राह छोडता ही नही था। कयीयो के डान्स परफॉर्मन्स हुए पर मंच पर नाचती इंदिरा के कदमो मे जैसे जादू था। रुहान की आंखों में जैसे इंदिरा की छबि छप सी गयी थी। उस दिन तो दोनों की बात हो ही नही पाई क्योंकि दोनों ने एक दूसरे को पहली दफा ही तो देखा था। पर इंदिरा उसके पसंदीदा कोने में बैठकर बार बार उस चेहरे को याद कर रही थी जो उसके आंखों के सामने से हिलनेका नाम नही ले रहा था। कुछ बात तो थी उस चेहरे में जो नृत्य देखना छोड़ इंदिरा उसकी हर एक हरकत हर एक अदा और खास कर उसका चेहरा जो बहुत कुछ बोल रहा था उसी में कैद होकर रह गयी थी। यह पहली बार हो रहा था उसके साथ। हा, आप सबने ठीक ही समझा। वह लड़का कोई और नही रुहान ही था। दिन बितते गए और इंदिरा फिर एक बार काम मे बिजी हो गयी। फिर एक रविवार सारे काम निपटाकर यूँही बैठी थी कि उसे किसी मित्र के facebook post पर रुहान की कुछ कमेंट दिखी। रुहान का sense of humour इंदिरा को काफी पसंद आया। ऐसा नही था कि उसने रुहान को फेसबुक पे ढूंढा नही था। पर पता नही उसे अपना मित्र बनाने से वह कतराती थी। शायद अब तक जितने लडके उसकी जिंदगी में आये उसीसे कुछ खटास दिल मे आ गयी थी। पर आज रुहान की उस कमेंट को उसने तुरंत लाइक कर दिया। रुहान तो कबसे उससे बात करना चाहता था पर Dance Program के दिन इंदिरा के बर्ताव से उसके दिल मे यह बात बस गयी थी कि इंदिरा को उससे बात करना रास नही आएगा। उसे लगा था कि उस दिन इंदिरा उसको टाल रही थी। पर आज जब उसकी कमेंट लाइक हो गयी थी, वह और कुछ सोचना नही चाहता था। रुहान ने तुरंत इंदिरा को ‘Friend Request’ भेज दी। यही नही उसे एक हल्का सा ‘Hi’ भी भेज दिया। इंदिरा के चेहरे पर वह एक Hi देख हलकिसी मुस्कान पता नही क्यूँ खिल उठीं थी। दोनो को बाते शुरू हुई और लगभग आधे घंटे में दोनों एकदूजे से ऐसे बात करने लगे जैसे बरसो की जान पहचान हो।  दोनो को एहसास था के दोनों एक दूसरे के लिए कुछ महसूस कर रहे है। लगभग दिनभर दोनो ने बातें की पर अब रुहान इंदिरा को मिले बिना रह नही पा रहा था। उसे जानना था के जिस लड़की को वह इतनी सालो से ढूंढ रहा था, हर लड़की के चेहरे में जिसे ढूंढता था क्या वह यही लड़की है? और रुहान बोल पड़ा के कल लंच पे मिलते हैं। इंदिरा के साथ बंद कमरे में कुछ पल बिताने के लिए मचलने वाले लड़को की तरह रुहान बिल्कुल नही था। एक नजर उसे देखने और क पल साथ बिताने के लिए बहुत दुर से कोई लड़का आनेवाला था।
                  आज सुबह का सूरज कुछ ज्यादाहि खिल रहा था या कल का चांद अभी तक जवान ही है। इंदिरा को घड़ी की रफ्तार आज बहुत धीमी लग रही थी। उसने wardrobe से उसकी मनपसंद सफेद कुर्ती निकाली जिसमे वह ज्यादा खिल जाती थी। आज बड़े प्यार से वह तैयार हो रही थी। इंदिरा भली भांति जान रही थी कि उसे प्यार हो गया है। अब बस उसे इंतज़ार था उस लम्हे का जब दोनों आमने सामने होंगे। वक़्त आज परीक्षा ले रहा था और दोनों के दिल कबके तय जगह पोहोच भी गए थे।क्या बाते होंगी क्या न होंगी, कितनी बार दोनो ने वह लम्हा आने से पहले ही जी लिया था।

To be continued

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