एक चिंगारी सुलगते हुए ज्वाला का रूप कब ले लेती है पता नही चलता। इसी प्रकार प्यार की आग इंदिरा और रुहान के दिल को, तन-बदन को जला रही थी। दोनो घंटो बाते करते। मगर मिलने की प्यास सिर्फ बातो से बुझे भी तो कैसे। इंदिरा जिस हुद्दे पर काम कर रही थी, वहासे उसका दिल कितना भी चाहे, मनचाही छुट्टी लेना आसान बात नही थी। एक दिन की छुट्टी मतलब दूसरे दिन काम का बोझ ऐसे बढ़ जाता कि पूछिये मत। और इंदिरा पर कई जिम्मेदारियां भी तो थी। अपने घर मे लाड़ प्यार से पली बढ़ी इकलौती इंदिरा शादीशुदा तो थी पर अपनी शादिसे उम्मीद छोड़ चुकी थी। जिस लड़किने कोई भी काम आधा अधूरा नही किया हो उसकी शादी सही मायनों में पूरी हो ही नही पायी। पति से लड़ाई झगड़े जैसे आम बात हो। और ये रिश्ता ही तो एक ऐसी चीज़ थी जो उसने खुदके लिए खुद चुनी थी। पिताजी का राजकीय व्यक्तित्व , मन में बैठा हुआ डर इन सबके कारण इंदिरा अपनी घुटन जाहिर कर ही नही पाती थी। बल्कि शादी के उस दलदल में वो फसती जा रही थी। इंदिरा की एक साल की बेटी ‘कियारा’उसकी जान थी। पर कियारा के सामने लड़ाईयों का रूप मारपीट और गाली गलौच में बदला तब इंदिरा के आत्म सम्मान को बुरी तरह ठेस लग गयी ,वह सह नही पायी। उसने अब यह पिंजरा तोड़कर खुले आसमान में उड़ने का फैसला कर लिया था। पर इस निर्णय तक आने में उसे बहुत वक्त लगा। आगे का सफर आसान नही था। office के निर्णय बखूबी लेनेवाली इंदिरा निजी जीवन मे बहुत संवेदनशील थी। कियारा के बारे में सोच सोच के वह चिंतित हो जाती। खुद के अकेले रहने के बारे में वह सोच भी नही रही थी। एक गलत रिश्ते में बंधे रहने से बेहतर वह अकेले रहना पसंद करती थी। ऐसे में उसके पिताजी और दोस्त उसकी ताकद बने। पर उसने कभी सोचा भी नही था के इस पड़ाव में आकर उसे सच्चा प्यार हो जाएगा। बातो बातो में इंदिरा ने अपनी पूरी कहानी रुहान को बता दी थी। रुहान ने भी इस निर्णय में उसका साथ ही दिया। पर वह हमेशा सोचता के काश वे दोनों पहले मिले होते। इंदिरा शादीशुदा न होती। तो उसके घर से इंदिरा और उसका रिश्ता खुशी खुशी मान लिया जाता। यहा तो कहानी ज्यादाहि मुश्किल थी। पर कहते हैं ना,आसानी से मिले वह प्यार , प्यार क्या?
दिमाग कहता था, आगे दोनो का भविष्य कुछ नही है पर नदी का बहाव अगर तेज हो तो समंदर से मिलने से उसे कौन रोक सकता है। दोनो ने तय कर लिया था कि वे आगे की नही सोचेंगे। आज मे जियेंगे। कल वैसे भी किसने देखा है? और आज में उनकी सबसे बड़ी समस्या सिर्फ यह थी कि वे दोनों कब और कैसे मिले। ऐसे में इंदिरा के पिताजी एक दिन पार्टी के काम से शहर से बाहर जानेवाले थे। अगली सुबह को वे लौटनेवाले थे। पर वह एक शाम उन दोनों के लिए क्या थी आप सब जान ही चुके होंगे। रुहान को सफर करना कुछ खास पसंद नही था पर इंदिरा के लिए किसी भी कोने से सफर करना उसके लिए बड़ी बात नही थी। 15 अक्टूबर 2017, मिलनेका दिन तय हो गया। इस बार रुहान ने इंदिरा के पसंद से पहनावा किया था। आसमानी रंग की शर्ट और जीन्स। रुहान का कद लंबा था और कसा हुआ शरीर, उसपे ऐसा पहनावा बहुत अच्छा दिखता था। इंदिरा ने घर समेटकर रखा था। कियारा को खेलने के लिए पड़ोस में भेज रखा था। बेचैन दिल से बार बार दीवार पर टंगी घड़ी को इंदिरा देखे जा रही थी जैसे वक्त को देखने से उसकी रफ्तार बढ़ जाएगी। और देखते देखते वह पल आ गया। जैसे ही door bell बजी,इंदिरा का दिल जोरो से धड़क उठा। इंदिरा खुद में एक बदलाव महसूस कर रही थी। जैसे फिरसे यौवन की सीढ़ी चढ़ रही हो। यह अल्हड़ पन, यह बेचैनी, रुहान के लिए उसकी कशिश सब पहले तो कभी नही हुआ था। दरवाजा खोलते ही रुहान को अपने सामने पाकर उसके गाल खिल उठे। रुहान को भी इंदिरा को देखकर ऐसे महसूस हुआ जैसे सालो से तपे हुए तन को अचानक से बरगद की छांव मिली हो। रुहान को इंदिरा का रहनसहन पहलेसेही भाता था। इंदिरा का घर भी वैसे ही था। हर चीज़ अपने जगह पर अच्छेसे रखी हुई। दीवार पर कियारा की बडी तस्वीर लगाई हुई थी। और राइटिंग टेबल पर इंदिरा की डायरी थी। शायद इंदिरा को लिखने का भी शौक था। रुहान को हमेशा यही लगता के और बहुत कुछ जानना है उसे। और अपने बारे में सब कुछ बताना भी है।
इंदिरा ने रुहान को अपने उस कोने में बिठाया जहा उसने किसीको नही बिठाया था। इंदिरा एक party person लड़की थी। दोस्तो के साथ बाहर घूमना, कभी उनके साथ drink करना उसके लिए आम बात थी। पर इंदिरा को सबसे ज्यादा पसंद था अपने कोने में बैठकर चाय पीना। इंदिरा को चाय इतनी पसंद थी कि कोई उसे चाय के लिए पूछे तो वह मना नही कर पाती थी। पर खुद के हाथों से बनी चाय पीने के लिए उसने किसीसे जिक्र तक नही किया था। पर रुहान के साथ इंदिरा को ऐसे लगता था जैसे वह खुद से ही मिल रही हो। इसके विपरीत रुहान को चाय पीने की बिल्कुल आदत नही थी। पर इंदिरा के साथ वह सब कुछ जीना चाहता था। इंदिरा के कमरेकी वह भारतीय बैठक,उसपर बैठे हुए वे दोनों प्रेमी और दो कप चाय। इससे बेहतर और क्या हो सकता है। चाय की एक प्याली दिमाग ताजा कर देती है पर चाय का असली स्वाद शब्दो मे कौन बता सकता है? पर फिरभी चाय की महक अपनी और खिंच ही लेती है जैसे प्यार हमे अपने आगोश में ले ही लेता है। देखा जाए तो बहुत आम मुलाकात थी। पर वे दोनों जानते थे वे क्या बाट रहे हैं। हमेशा याद रहनेवाले हसीन लम्हे, अधूरे सपने, एक मनचाही शुरुवात और प्यार भरा एहसास.....
चाय पीने के बाद इंदिरा रुहान की गोद मे सर रखकर लेट गयी। रुहान अपने हाथों से इंदिरा के बाल सहला रहा था। बचपन मे इंदिरा जब भी पापा की गोद मे ऐसे ही सोया करती थी, उसे पापा का हाथ सिर पर घूमते ही नींद आ जाती थी। अब तो गहरी नींद सोये हुए जैसे जमाना हो गया था। आज रुहान का हाथ इंदिरा के बालोको छू रहा था, नजाने क्यों इंदिरा के आंसू छलक पड़े। ऐसे प्यार भरे स्पर्श के लिए मानो तरस गयी हो सालो से। रुहान ने बड़े प्यार से इंदिरा के गालो को छूआ। अपने हाथों में उसके गाल पकड़कर माथे को चुम लिया तब इंदिरा और रुहान की आंखे मिली। कितना कुछ था उन दोनों की आंखों में। सच है, आंखे जो बातें कहती है, शब्द कभी बयान नही कर पाते। रुहान ने इंदिरा को अपने पास खिंच लिया। अब मिलने की बारी सांसो की थी। आज दोनो के होंठ कुछ इस कदर मिल रहे थे जैसे अरसे से यह अहसास हुआ ही न हो। दोनो दीवानो की तरह एक दूसरे से लिपट गए थे। उस शाम प्यार की कुछ ऐसी बरसात हुई कि सर से लेकर पैरों तक दोनो भीग भी गए थे और फिर भी लग रहा था कोई कोना अभी भी सूखा है। चाय की प्याली गरम गरम पी ले तो जबान जल जाती है ना।चाय थोड़ा ठंडा होनेकी राह तो देखनी ही पड़ती है। उसी तरह, इंदिरा और रुहान....जीवन की आग में तपे हुए दो प्रेमी, आज एक दूसरे को प्यार तो कर रहे थे पर यह आग जिस्म की होती तो शांत भी हो जाती। यहा आग तन मन दोनों के परे थी। प्यार की चिंगारी अभी अभी तो सुलगी थी जिसमें दोनों की रूह एक हो चुकी थी। अब यह ज्वाला सब कुछ राख करेगी या दिया बाती बनके सबको रोशनी देगी यह तो वक्त ही बताएगा।
To be continued--
कहानीया
Sunday, February 17, 2019
एक कोना और दो कप चाय -पहली चाय
एक कोना और दो कप चाय- पहली मुलाकात
इंदिरा आज काम तो कर रही थी पर आंखे बार बार घड़ी देखे जा रही थीं। सुबह से दो बार रुहान से बात भी हो चुकी थी। इंदिरा को यह देखकर खुदही पर इतना आश्चर्य हो रहा था कि कोई उससे मिलने आ रहा है इस बात पर उसका दिल इतनी जोरो से धड़क उठेगा। रुहान घर से निकल चुका था। रुहान के घरसे इंदिरा का office करीब दो घंटों का सफर था। और ये दो घंटे सिर्फ उस आधे घंटे के लिए बितने वाले थे। रुहान को पता नही था कि यह आधे घंटेकी मुलाकात उसकी जिंदगी बदलनेवाली थी। रुहान के आँखों के सामने से उसका बिता कल किसी फिल्म की तरह यूँ ऐसे गुजरा जैसे ट्रेन की पटरी परसे ट्रेन गुजर जाती है। रुहान जैसा भी था , था तो दिलवाला लड़का। व्यापार कारोबार से घरका रिश्ता होनेवाला रुहान किसी भी मामले में व्यापार करना नही जानता था। वह सुनता तो बस्स खुदके दिल की। गलती हुई तो भी मेरी और अच्छा हुआ तो भी दिल का सुनके गलत नही किया इतनी आसान सोच थी उसकी। इंदिरा से कल घंटो बात करना और आज उसे मिलने के लिए कहासे कहा सफर करना उसके दिल की ही आवाज थी। यहा इंदिरा ने office में पहले से बता रखा था कि आज किसी सहेली के साथ वह lunch करेगी। उसे पता था, दोनो को कुछ ज्यादा वक्त नही मिलेगा पर फिर भी वह रुहान को आने से मना नही कर पाई थी।
घड़ी की सुईयों ने आखिर दोनो के दिल की सुन ली। रुहान स्टेशन पोहोच गया था जहासे इंदिरा उसे MacD लेकर जानेवाली थी। रुहान ने तो पहले ही कहा था ना , खाने के लिए मैं कही पर भी जा सकता हूं। सच भी था वैसे। रुहान को अलग अलग तरह के व्यंजन खाना बेहद पसंद था पर आज वह खाने के लिए नही किसीको जी भर के देखने के लिए, किसी से पेटभर बाते करने के लिए आया था। इंदिरा स्टेशन पोहोच गयी थी पर रुहान तो दिख नही रहा था। दोनो की फोन पर बात हुई तब पता चला,रुहान ने इंदिरा की बात गलत समझ ली थी और वह तय स्थान के काफी आगे जाकर रुका था। पहले से वक्त कम था और उसमें एक दूसरे की खोज में जो वक्त जाया हो रहा था , रुहान को खुद पर ही गुस्सा आ रहा था। इंदिरा की आंखे रास्ते पर चीते की तरह घूम रही थी और आहा.....वह रहा रुहान.....इंदिरा को आखिर उसका रुहान दिख ही गया जो अभीभी उसे ढूंढ रहा था। पलभर स्टेशन के उसी भीड़ में इंदिरा अपने ही जगह पे खडी हो गयी, रुहान को आते वक्त देखना जैसे आसपास का चित्र उसके लिए उस पल ठहर गया था। चल रहा था तो उसका रुहान और दौड़ रही थी , इंदिरा की धड़कन। अब जाकर इंदिरा थोडी सम्भली और उसने रुहान को बताया के वह उसे देख पा रही है और वह जहा है वही पर रुके।क्योंकि वही से ऑटो लेकर दोनो को MacD तक जाना था। अब वह पल था, जब रुहान की सांसें रुक गयी थी। जिस पल उसने इंदिरा को देखा बस्स वह देखते ही रह गया। इसी पल के इंतजार में जैसे पूरी जिंदगी बित गयी हो। रुहान के ज़िन्दगी में तो कई लड़कियां आयी थी। किसी एक से जिंदगी भर का प्यार होना जैसे उसके लिए असंभव हो। पर इंदिरा को पहली दफा देखा तबसे लेकर यह आजकी मुलाकात रुहान के दिल से कुछ कह रही थी। जैसे उसका दिल संभालने वाली उसे मिल गयी। उसकी soulmate, जिसे वह कबसे ढूंढ रहा था। इंदिरा को देखते ही रुहान को उसे गले लगाना था। वह तो था ही दीवाना। पर उसने खुदको संभाला। सोचा यह पहली मुलाकात है वह क्या सोचेगी। दोनो ने ऑटो ली। और बैठतेही दोनों की आंखे एक दूजे में खो गयी। दोनो इतने अजनबी थे के पहली मुलाकात में बात होना भी मुश्किल लगे। पर यहाँ आंखों से आंखे और होंठो से होंठ कब मिले उन्हें पता ही नही चला। स्टेशन से MacD अमूमन १० मिनट का अंतर था। पर आज मानो २ मिनट में ही पार हो गया। रुहान को बड़ा अटपटा लगा के इतनी जल्दी दोनों पोहोच भी गए। रुहान आज इंदिरा के सामने रुहान बनकर दो पल जी लेना चाहता था। इसीलिए उसने अपना पहनावा भी साधारण ही रखा था जो उसका comfort zone था। सफेद रंग की tshirt जिसमे आड़ी रेखाएँ थी और नीचे पजामा। जब इंदिरा ने रुहान को देखा था तब एक पल को तो उसे भी रुहान का पहनावा पसंद नही आया था। वह खुद भी तो इतना तय्यार हुई थी उसके लिए। और पहली दफा जब उसने रुहान को देखा था वह रुहान और आजका रुहान दोनो में काफी अंतर था। उस दिन रुहान एक बेहद खूबसूरत लड़का जिसमे तमीज है, जो काफी तजुर्बा रखता है जिंदगी का कुछ इसी प्रकार की छवि थी इंदिरा के दिल मे। और आज रुहान एक खुशमिजाज लड़का जिसमे आज भी एक बच्चा ज़िंदा है ऐसे ही मालूम हो रहा था। आज तक के इंदिरा के स्वभाव अनुसार रुहान उसे पसंद नही आता पर यहाँ बात कुछ और ही हो रही थी। इस बच्चेवाले रूप पे इंदिरा का दिल और ही आ रहा था। उसे रुहान के बारे में सब कुछ जानना था। और अपनी जिंदगी की किताब उसके सामने खोल कर रखनी थी। MacD में ऑर्डर देकर दोनो एक table लेकर बैठ गए। दोनो की नजरें होठो से ज्यादा बाते कर रही थी। दिवाना रुहान वहा पर भी इंदिरा को छूना चाह रहा था। उसके गालो को अपने हाथोंमें थामकर उसके होठो को चूमना चाहता था। पर इंदिरा की नजरें पीछे बैठी लड़कियों को देखकर रुहान को रोक रही थी। इंदिरा के लिए तो दुनियां के सबसे खूबसूरत लड़के के साथ वह बैठी हुई थी और सब उन्ही को देख रहे थे। ऐसे में रुहान की इच्छा कैसे पूरी हो। बातो बातो में समय पर लगाकर उड़ गया। जहा आधे घंटे के लिए मिल रहे थे वहां घंटेभर के ऊपर ही दोनों वहा बैठे थे। दिल तो वापसी के लिए मान ही नही रहा था। रुहान ने तो इंदिरा को छुट्टी लेने को भी कह दिया। पर office का कुछ अनुशासन होता है। इंदिरा चाहकर भी छुट्टी लेकर रुहान के साथ वक़्त बिता नही पा रही थी। ना चाहते हुए भी दोनो वहा से निकले। रुहान washroom जाना चाहता था। MacD की इमारत दो मंजिला थी। और washroom ऊपर की मंजिल पर था। इंदिरा नीचे ही रुहान के लिए रुकी थी। तभी इंदिरा का फोन बजा। रुहान का ही फ़ोन था। उसने इंदिरा को ऊपर आने के लिए कहा। इंदिरा भली भांति जानती थी के रुहान उसे क्यो बुला रहा है और इंदिरा ने ऐसा पागलपन कभी नही किया था। पर नजाने क्यों, रुहान की आवाज में वासना की पुकार नही,प्यार की मिठास थी जो इंदिरा को खिंच रही थी। इंदिरा असमंजस में थी के वह क्या कर रही है पर उसके पैर ऊपर की सीढ़ियां चढ़ चुके थे। ऊपर पोहोची तो इंदिरा ने देखा वहां कोई भी नही था और लड़कों की washroom से रुहान इंदिरा को ही देख रहा था। दरवाजे की छोटीसी खुली जगह से रुहान कि आंखे बड़ी प्यारी लग रही थी। इंदिरा मन ही मन बहुत डरी हुई थी कि किसीने देख लिया तो लोग क्या सोचेंगे। पर रुहान को मना भी तो नही कर पा रही थी। डरी सहमी इंदिरा जैसे ही washroom के अंदर गयी, रुहान ने उसे दीवार पर दबाकर खड़ा किया और खुद उसे प्यार करने लगा। रुहान के हाथ इंदिरा को तेजी से छू रहे थे। रुहान के होंठ कभी इंदिरा के होंठो को चूमते तो कभी उसके सीने को छूते। इंदिरा उस पल में सारी शर्म चिंता भूल ही रही थी कि बाहर से किसीने दरवाजा खटखटाया। अब इंदिरा बहुत ज्यादा डर गई।बाहर का आदमी तो कही नही जानेवाला था पर वह अब बाहर कैसे निकले। उसे लगा कोई जादू हो और वह गायब हो जाये। पर कलियुग में चमत्कार कहा होते हैं? रुहान भी डरा तो था। उसे खुदकी चिंता नही थी। पर इंदिराको कोई गलत नजरियेसे देखे ये उसे मंजूर नही था। उसने आहिस्ता दरवाजा हल्केसे खोलकर देखा तो बाहर एक लड़का खड़ा था जिसे washroom का इस्तेमाल करना था। रुहान ने फिर एक बार दरवाजा लगा दिया। इंदिरा का सबर अब टूट रहा था। एक तरफ वह office के लिए late भी हो रही थी। दूसरी तरफ यह दुविधा के बाहर कैसे निकले। पर रुहान को पूर्ण विश्वास था कि अब तक लड़का वहासे हट गया होगा। उसने उसी भरोसे के साथ दरवाजा खोला। सच मे वहा कोई नही था। उसने इंदिराको झटसे वहासे निकलने को कहा। इंदिरा सिर झुकाए जल्दीसे वहा से निकली। MacD में ऊपर जहा बैठनेकी व्यवस्था है वही पर वह लड़का टहल रहा था । इंदिरा की आंख के एक कोने ने उस लड़के को देखा तो पर अब वहा और रुकने की उसमे हिम्मत नही थी। जान लेकर नीचे उतरी इंदिरा नेMacD के बाहर निकल कर ही छुटकारा पाया। रुहान इंदिरा के office तक उसी के साथ चलने वाला था। दोनो को अभीभी विश्वास नही हो रहा था कि पिछले पांच मिनट पहले क्या हुआ। इंदिरा जो कि एक बहुत बडी job profile रखती थी उसके लिए यह पागलपन कोई मामूली बात नही थी। पर फिर भी उसे यह सब अलग और अच्छा लगा।
दोनो इंदिरा के office के बाहर खड़े थे। इंदिरा को अब रुहान से विदा लेना मुश्किल भी था और वक्त की नजाकत पर उतना ही जरूरी भी। दोनो ने विदा ले तो ली पर दोनों को पता था जिस कहानी की शुरुआत ही इतनी पागलपन के साथ हुई है, वह कहानी आगे जाकर एक दिलचस्प किताब बनेगी जिसे पढ़कर हर कोई फिरसे प्यार करना चाहेगा।
To be continued---
एक कोना और दो कप चाय
बचपन का वह कोना आज भी याद होगा सभी को। जहाँ नजाने कितनी मस्ती,कितना खेलकूद आज भी गुंजता होगा। एक कोना ही तो होता है जहाँ हम खुद को समेटे खुद ही मे सिमटे रहना चाहते हैं। हम बढ़े तो हो जाते हैँ पर मन ही मन वह बच्चा कही उसी कोने में सिमटकर रह जाता है। ऐसे ही एक कोने की कहानी है यह......इंदिरा और रुहान की कहानी।वे दोनों और दो कप चाय.. एक गरमागरम रिश्ते की दिलचस्प कहानी।
इंदिरा और रुहान, एक दुसरे से कई दूर, अलग अलग संस्कृती मे पले बढे दो लोग। जिनमे वास्तविक कोई समान धागा होना लगभग नामुमकीन था। भाषांये भिन्न, खानपान, त्योहार किसीं चीझ मे देखा जाये तो कोई मेल ही नही। पर राह के कुछ ऐसे मोड पर दोनो मिले जैसे दोनो को एक दुसरे की ही तलाश थी। दोनो ने ही अपनी अपनी दुनिया के हर स्वाद को चखा था। फिर भी कुछ कमी तो थी। जैसे थाली भरी तो है मगर नमक किसीमे न हो। दोनो के ही दिल का वह सुकून भरा कोना खाली था। इंदिरा, एक बहुत बडे कोर्पोरटर की इकलौती संतान थी। देखनेवाले हमेशा यही सोचते की क्या किसमत पाई है लडकीने। जो चाहे उसे सब मिल सकता है। पर सचसे हमेशा समाज अन्जान ही होता है। दिखावे की चीझे तो सब थी उसके पास पर इंदिरा की खुशी उन सब मे नही थी। बचपन से ही इंदिरा के पैर संगीत की आगाझ पर थिरकते थे। पर नाच गाने को अलग ही रूप मे देखनेवाले उसके पापा को इंदिरा का नाचना बिल्कुल पसंद नही था। इंदिरा उसका इकलौता सपना कभी पुरा कर ही नही पायी। दिल के किसीं कोने मे हमेशा झुंजति इंदिरा बाहरी रूप से हमेशा मुस्कुराती खिलखिलाती। इंदिरा पे सारे दोस्त जान छिडकते थे। पर प्यार .....वहाँ भी कुछ अलग ही हाल था। इंदिरा का रूप देखकर , उसके स्वभाव के प्रति आकर्षित होकर बहुतोने उसे पाना चाहा। फर्क सिर्फ इतना कि हर बार इंदिरा ने जिसे प्यार समझा वह कभी प्यार न था। लोग आते तो थे पर किसी की मंजिल इंदिरा पता नही क्यों नही बन पाई। हमेशा दिल टूटने पर दिल खोलकर रोना चाहनेवाली इंदिरा आंखों में आंसू आये तो उन्हें भी आंखों से ही वापस लौटा देती। शायद किसी के जाने से इंदिरा को भी उतना फर्क नही पड़ा। शायद प्यार का असली स्वाद चखना अभी बाकी था। इंदिरा के आलीशान बड़े घर मे उसी के कमरे में एक कोना था जहाँ मात्र वह अकेले रहना पसंद करती थी। इंदिरा का बचपन, उसकी जवानी उसके सपने अगर किसी ने देखे थे तो वह था ‘वह कोना’। नृत्य के सपने देखनेवाली इंदिरा पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थी। पर उसका काम सिर्फ चंद पैसे कमाने का साधन था उसके लिए जिससे वह खुदके पैरों पर खड़ी तो थी।
जहाँ इंदिरा मनचाही मंजिल चाहकर भी पा ना सकी वहाँ दूसरी ओर रुहान अपनी मंजिल के प्रति कोई समझौता नही करनेवाला इंसान था। उसके सपनें पाने के लिए हमेशा से ही घरसे अलग रह रुहान काम को ही उसका प्यार मानता था। कहते है ना, अगर अपनो का साथ हो तो मुश्किल सफर भी सुहाना हो जाता है। रुहान भी उसके घर का इकलौता बेटा था। माँ के आंखों का तारा रहनेवाला बच्चा सोचो माँ से दूर रहना कितना मुश्किल होता होगा। माँ का हाल भी कुछ अलग नही था। पर फिर भी अपनी ममता को संभाले दिल पर पत्थर रखके मा ने रुहान को मुम्बई भेज दिया। सपनो का शहर, मुम्बई। पर किसी पर दया भी ना करनेवाली मुम्बई। बहुत बार रुहान हिम्मत हार जाता था। ऐसे में माँ ही उसका ढाढस बंधा ती थी। पर कई बार रुहान को अकेलापन कांटने दौड़ता। रुहान ऐक्टर बनना चाहता था। किसी की सहारे के बिना सफर मुश्किल था पर रुहान में काबिलियत थी और खुदके सपनो पर रुहान को अडिग भरोसा था। जहाँ इंदिरा को शोर पसंद था वहाँ रुहान को शांति पसंद थी। इंदिरा को घूमना फिरना पसंद था तो रुहान को घर बैठकर चीज़े observe करना अच्छा लगता था।
कला के प्रति रुचि यह देखा जाए तो एकमात्र धागा दोनो को बांध सकता था। पर कुदरत जब कोई कहानी लिखती है तब हर किरदार के पहलू कुछ अलग ही निखर आते हैं। वह 15 अगस्त का दिन था । इंदिरा को एक नृत्य प्रतियोगिता में शामिल होने का अवसर मिला था जहाँ रुहान भी एक प्रतियोगी था। रुहान वैसे भी अपने सपने को पाने की कोई राह छोडता ही नही था। कयीयो के डान्स परफॉर्मन्स हुए पर मंच पर नाचती इंदिरा के कदमो मे जैसे जादू था। रुहान की आंखों में जैसे इंदिरा की छबि छप सी गयी थी। उस दिन तो दोनों की बात हो ही नही पाई क्योंकि दोनों ने एक दूसरे को पहली दफा ही तो देखा था। पर इंदिरा उसके पसंदीदा कोने में बैठकर बार बार उस चेहरे को याद कर रही थी जो उसके आंखों के सामने से हिलनेका नाम नही ले रहा था। कुछ बात तो थी उस चेहरे में जो नृत्य देखना छोड़ इंदिरा उसकी हर एक हरकत हर एक अदा और खास कर उसका चेहरा जो बहुत कुछ बोल रहा था उसी में कैद होकर रह गयी थी। यह पहली बार हो रहा था उसके साथ। हा, आप सबने ठीक ही समझा। वह लड़का कोई और नही रुहान ही था। दिन बितते गए और इंदिरा फिर एक बार काम मे बिजी हो गयी। फिर एक रविवार सारे काम निपटाकर यूँही बैठी थी कि उसे किसी मित्र के facebook post पर रुहान की कुछ कमेंट दिखी। रुहान का sense of humour इंदिरा को काफी पसंद आया। ऐसा नही था कि उसने रुहान को फेसबुक पे ढूंढा नही था। पर पता नही उसे अपना मित्र बनाने से वह कतराती थी। शायद अब तक जितने लडके उसकी जिंदगी में आये उसीसे कुछ खटास दिल मे आ गयी थी। पर आज रुहान की उस कमेंट को उसने तुरंत लाइक कर दिया। रुहान तो कबसे उससे बात करना चाहता था पर Dance Program के दिन इंदिरा के बर्ताव से उसके दिल मे यह बात बस गयी थी कि इंदिरा को उससे बात करना रास नही आएगा। उसे लगा था कि उस दिन इंदिरा उसको टाल रही थी। पर आज जब उसकी कमेंट लाइक हो गयी थी, वह और कुछ सोचना नही चाहता था। रुहान ने तुरंत इंदिरा को ‘Friend Request’ भेज दी। यही नही उसे एक हल्का सा ‘Hi’ भी भेज दिया। इंदिरा के चेहरे पर वह एक Hi देख हलकिसी मुस्कान पता नही क्यूँ खिल उठीं थी। दोनो को बाते शुरू हुई और लगभग आधे घंटे में दोनों एकदूजे से ऐसे बात करने लगे जैसे बरसो की जान पहचान हो। दोनो को एहसास था के दोनों एक दूसरे के लिए कुछ महसूस कर रहे है। लगभग दिनभर दोनो ने बातें की पर अब रुहान इंदिरा को मिले बिना रह नही पा रहा था। उसे जानना था के जिस लड़की को वह इतनी सालो से ढूंढ रहा था, हर लड़की के चेहरे में जिसे ढूंढता था क्या वह यही लड़की है? और रुहान बोल पड़ा के कल लंच पे मिलते हैं। इंदिरा के साथ बंद कमरे में कुछ पल बिताने के लिए मचलने वाले लड़को की तरह रुहान बिल्कुल नही था। एक नजर उसे देखने और क पल साथ बिताने के लिए बहुत दुर से कोई लड़का आनेवाला था।
आज सुबह का सूरज कुछ ज्यादाहि खिल रहा था या कल का चांद अभी तक जवान ही है। इंदिरा को घड़ी की रफ्तार आज बहुत धीमी लग रही थी। उसने wardrobe से उसकी मनपसंद सफेद कुर्ती निकाली जिसमे वह ज्यादा खिल जाती थी। आज बड़े प्यार से वह तैयार हो रही थी। इंदिरा भली भांति जान रही थी कि उसे प्यार हो गया है। अब बस उसे इंतज़ार था उस लम्हे का जब दोनों आमने सामने होंगे। वक़्त आज परीक्षा ले रहा था और दोनों के दिल कबके तय जगह पोहोच भी गए थे।क्या बाते होंगी क्या न होंगी, कितनी बार दोनो ने वह लम्हा आने से पहले ही जी लिया था।
To be continued